आखिर भगवान भी किसकी शरण में जाते हैं ?
कहानी का शीर्षक:
"आखिर भगवान भी किसकी शरण जाते हैं?"
सभी देवी-देवताओं की पूजा का आधार भी कोई है ?
बहुत-बहुत पुरानी बात है...
एक महान साहूकार था — धन, दौलत, प्रतिष्ठा में सर्वश्रेष्ठ।
उसका जीवन सुख और सफलता से भरा था।
गरीबों की मदद करना, दान धर्म करना — ये उसके जीवन का हिस्सा था। और उसके घर में एक छोटा-सा नौकर भी था — सच्चा, सरल और मेहनती।
नौकर रोज़ देखता कि साहूकार तो सब कुछ मिलता जा रहा है —
"आखिर इसका रहस्य क्या है?"
वह हर काम को ध्यान से देखता, लेकिन एक दिन उसकी नजर पड़ी-
साहूकार चोरी-छुपे एक ओर जा रहा है।
नौकर की कजिज्ञासा जागी —
"कहाँ जा रहे हैं मालिक? किसके आगे सिर झुका रहे हैं?"किस से यह सब कुछ लेकर आ रहे हैं?
उसने चुपके-चुपके साहूकार का पीछा किया।
देखा — साहूकार एक सुंदर मंदिर में जाकर भगवान गणेश जी के आगे सिर झुका रहा है।
लड्डू, दूर्वा, फूल अर्पित कर रहा है, बहुत श्रद्धा से।
नौकर ने सोचा —
"जिसके पूजन से मेरे मालिक इतने सुखी हैं, वह गणेश जी कितने महान होंगे!
मैं भी इन्हीं की भक्ति करूँगा।"
अब नौकर ने भी मन लगाकर गणेश जी की पूजा शुरू कर दी।
कुछ समय बीता...
फिर मन में एक और सवाल उठा —
गणेश जी की भक्ति करने के बाद भी नौकर सोचने लगा —
"मेरे जीवन में भी थोड़े सुख आ रहे हैं, परंतु वह पूर्णता नहीं आ रही।"
"क्यों?"
फिर उसे बोध हुआ —
"जिसके पास जितना है, वह उतना ही दे सकता है।"
साहूकार के पास जितना है, उसमें से थोड़ा मुझे दे देता है।
साहूकार, गणेश जी से लेता है। गणेश जी के पास भी जितना होगा उतना ही वह साहूकार को देंगे।
"लेकिन गणेश जी को यह शक्ति मिलती कहाँ से है?"
"क्या गणेश जी भी किसी के आगे नतमस्तक होते हैं?"
अब नौकर की जिज्ञासा और बढ़ गई।
एक दिन छुपकर देखा —
गणेश जी भी प्रेम और श्रद्धा से भगवान शंकर की उपासना कर रहे हैं!
अब नौकर का बोध और गहरा हुआ।
"अगर गणेश जी भी शंकर जी के आगे नतमस्तक हैं, तो असली शक्ति तो शंकर जी में है।"
अब उसने शंकर जी की आराधना शुरू कर दी।
और फिर भी उसका मन नहीं रुका...
एक दिन उसने फिर देखा —
"शंकर जी भी किसी अदृश्य प्रकाश में लीन हैं!"
ध्यान मग्न हैं — एक प्रकाशमय ज्योति, अजर अमर बिंदु के आगे।
जो न आदि है, न अंत। शंकर जी शिवलिंग की आराधना कर रहे थे।
नौकर की आँखें खुल गईं!
वह भीतर से पुकार उठा —
"यही है असली सर्वशक्तिमान!
यही है परमपिता परमात्मा —
जिनकी शक्ति से ही गणेश पूजनीय बने, शंकर पूजनीय बने, और मालिक भी सुखी बने!"
अब नौकर ने उस निराकार, ज्योति स्वरूप, प्रेम और शक्ति के सागर परमात्मा को याद करना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे, उसके जीवन में परिवर्तन आने लगे।
वह साधारण नौकर से —
आध्यात्मिक राजा बन गया!
उसके चेहरे पर एक ऐसी आभा फैल गई जो कहती थी —
"यह आत्मा अब खुद को सर्वशक्तिमान की गोद में अनुभव कर रही है।"
कहानी से यह सीख मिलती है —
"जिसके पास जितना है, वह उतना ही दे सकता है।"
देवी-देवता पूजनीय हैं, वे मार्गदर्शक हैं, प्रेरणास्त्रोत हैं।
लेकिन वे भी एक परम स्रोत — परमपिता परमात्मा से ही शक्ति प्राप्त करते हैं।
परमात्मा निराकार हैं — ज्योति स्वरूप, ज्ञान और प्रेम के अथाह सागर।
जब हम उस परम स्रोत से जुड़ जाते हैं,
तो हमें भी असीम प्रेम, शक्ति और आनंद स्वतः प्राप्त होने लगते हैं।
महत्वपूर्ण बात:
यह कहानी मूर्ति पूजा का खंडन नहीं करती।
यह केवल प्रेमपूर्वक मार्गदर्शन करती है कि सभी पूज्य शक्तियों के पीछे भी एक परम स्रोत है, और उसी परम स्रोत से हमें प्रत्यक्ष जुड़ने का सुंदर अवसर है। हमें निराकार परमपिता परमात्मा को पहचान कर उन्हें याद करना है
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