रस्सी जब एक छोड़ दे, तो खींचना बंद हो जाता है। कहानी
रस्सी जब एक छोड़ दे, तो खींचना बंद हो जाता है। कहानी
🪢 जब एक छोड़ दे, तो खींचना बंद हो जाता है
जब दो लोग रस्सी खींच रहे होते हैं,
तो खेल तभी तक चलता है,
जब दोनों अपनी-अपनी ओर से ज़ोर लगाते हैं।
लेकिन जैसे ही एक व्यक्ति रस्सी छोड़ देता है,
दूसरा चाहे जितना भी खींचे,
अब कोई संघर्ष नहीं रहता —
क्योंकि खींचना तभी तक संभव है, जब दूसरा भी खींच रहा हो।
जीवन के रिश्ते भी कुछ ऐसे ही होते हैं।
कभी परिवार में, कभी दोस्ती में,
कभी पति-पत्नी के बीच भी —
दोनों अपने-अपने अहंकार और अपेक्षाओं की रस्सी थामे रहते हैं।
पति-पत्नी की एक कहानी बताती हूं
पति देर रात घर लौटता था,
पत्नी हर रात नाराज़ होकर कुछ न कुछ कहती थी।
दोनों में रोज़ बहस होती थी —
रस्सी दोनों तरफ़ से खिंच रही थी।
एक दिन पत्नी ने चुपचाप रस्सी छोड़ दी —
न शिकायत की, न ग़ुस्सा किया।
सिर्फ़ शांत स्वर में कहा,
“थक जाते हो, पहले खाना खा लो।”
कुछ दिन बाद पति ने खुद कहा —
“तुम बदल गई हो… और अब मैं भी कोशिश करूँगा।”
रस्सी वहीं ढीली पड़ गई,
जहाँ प्रेम ने स्थान ले लिया,
और अहंकार ने चुपचाप सिर झुका दिया।
✨ जीवन का सार है
रिश्ते तब उलझते हैं, जब हम “सही साबित” होना चाहते हैं।
पर जब हम “शांत रहना” चुन लेते हैं,
तो खींचतान अपने आप ख़त्म हो जाती है।
कभी-कभी रस्सी छोड़ देना हार नहीं —
बल्कि रिश्ते को बचाने की सबसे बड़ी जीत होती है। 💫
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