मुसीबत में चुप रहो
मुसीबत में चुप रहो
“मुसीबत में चुप रहो…”
एक नन्ही सी चिड़िया थी —
बहुत खुश, बहुत उत्साहित।
सर्दियाँ आने लगी थीं,
उसे दक्षिण की ओर उड़ जाना था।
लेकिन खुशी के मारे वो बात भूल गई —
समय पर उड़ान भरना।
थोड़ी देर हो गई।
जब उड़ान भरी,
तो ठंड इतनी बढ़ गई कि
उसके पंख जम गए…
और वो नीचे गिर पड़ी।
वो गिरी तो खेत में,
जहाँ एक गाय गुजर रही थी —
उसने चिड़िया पर गोबर कर दिया।
पहले तो उसे बहुत गंदा लगा,
लेकिन धीरे-धीरे
गोबर की गर्मी से
उसके पंख पिघलने लगे।
वो फिर से साँस ले पा रही थी,
फिर से ठीक हो रही थी।
पर तभी उसने गलती की —
वो ज़ोर-ज़ोर से चहकने लगी।
उधर से एक बिल्ली गुजर रही थी,
उसने चिड़िया को निकाला…
और खा गई।
तो याद रखो —
हर वो जो तुम पर “गोबर डालता है”,
वो दुश्मन नहीं होता।
और हर वो जो “निकालता है”,
वो दोस्त नहीं होता।
कभी-कभी चुप रहना ही बुद्धिमानी होती है।
क्योंकि मुसीबत में ज़्यादा बोलना —
मुसीबत को और बड़ा कर देता है। 🕊️
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