महालक्ष्मी व्रत कथा
Kya🪔 महालक्ष्मी व्रत कथा – 100 कौरव और 5 पांडव
महाभारत काल में, हस्तिनापुर में महर्षि वेदव्यासजी ने रानी कुंती और रानी गांधारी को महालक्ष्मी व्रत करने की सलाह दी। देवी लक्ष्मी की कृपा से ही घर में ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है।
गांधारी ने नगर की सभी महिलाओं को अपने यहाँ पूजा के लिए आमंत्रित किय और उसके 100 पुत्रों ने मिट्टी का एक विशाल हाथी भी बनवाया। किंतु ईर्ष्या के कारण उन्होंने कुंती को बुलाना उचित नहीं समझा। जिस कारण सभी महिलाएं उस बड़े हाथी का पूजन करने के लिए गांधारी के यहां चली गईं।
इस अपमान से कुंती बहुत दुखी हुईं। जब अर्जुन ने अपनी माता का व्यथित मन देखा, तो उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपनी माँ की प्रतिष्ठा अवश्य बढ़ाएँगे। अर्जुन ने कहा- 'हे माता! आप पूजन की तैयारी करें और नगर में बुलावा लगवा दें कि हमारे यहां स्वर्ग के ऐरावत हाथी की पूजन होगी।
अर्जुन स्वर्गलोक पहुँचे और इंद्रदेव से विनम्र निवेदन किया कि वे ऐरावत हाथी को धरती पर ले जाना चाहते हैं। इंद्र अर्जुन की माँ-भक्ति से प्रसन्न होकर अनुमति प्रदान करते हैं।
इधर माता कुंती ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया और पूजा की विशाल तैयारी होने लगी। सारे नगर में शोर मच गया कि कुंती के महल में स्वर्ग से इन्द्र का ऐरावत हाथी पृथ्वी पर उतारकर पूजा जाएगा। समाचार को सुनकर नगर के सभी नर-नारी, बालक एवं वृद्धों की भीड़ एकत्र होने लगी। उधर गांधारी के महल में हलचल मच गई। वहां एकत्र हुईं सभी महिलाएं अपनी-अपनी थालियां लेकर कुंती के महल की ओर जाने लगीं। देखते ही देखते कुंती का सारा महल ठसाठस भर गया। और गांधारी का महल खाली हो गया।
स्वागत और पश्चाताप:
धरती पर ऐरावत के आगमन पर कुंती ने उसका भव्य स्वागत किया और गजलक्ष्मी पूजन किया। सभी नगरवासी प्रसन्न हुए। उस समय गांधारी को अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ और उन्होंने कुंती से क्षमा माँगी।
निष्कर्ष:
तभी से गजलक्ष्मी पूजन की परंपरा प्रारंभ हुई। माना जाता है कि ऐरावत पर विराजमान महालक्ष्मी की पूजा से घर-परिवार में धन, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है।
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