श्री कृष्ण ने बांसुरी क्यों तोड़ी ??
भारतीय परंपराओं के अनुसार…।।
जब श्रीकृष्ण ने…
कंस का वध करने के लिए मथुरा जाने का निश्चय किया,।।
तब उन्होंने… गोकुल की लीला पूर्ण मानी।
राधा और गोपियों से… विदा लेने के बाद,
श्रीकृष्ण ने यमुना किनारे… अपनी बांसुरी तोड़ दी…
और उसे… यमुना में प्रवाहित कर दिया।
ताकि अब वे…
फिर कभी उसे बजाकर गोपियों को नहीं बुलाएँ।
अब वे… उस स्वर… उस प्रेम… और उस जीवन को…
पीछे छोड़ रहे हैं।
यह… त्याग का प्रतीक था —
पुराने मोह और आसक्ति को छोड़कर,
नए कर्तव्य… लोक-कल्याण…
और धर्मस्थापना के कार्य में…
पूरी तरह लगने का संकल्प लिया।
यह घटना… लगभग श्री कृष्णा की 16 वर्ष की आयु में मानी जाती है…
क्योंकि इसी समय… वे वृंदावन से स्थायी रूप से चले गए थे…
और मथुरा-आगमन के बाद…
द्वारका की लीलाएँ आरंभ हुईं।
श्रीकृष्ण की बांसुरी तोड़ने की लीला…
और द्वारका की लीलाओं का संदेश यही है…
कि जीवन में…
हर समय का…
अपना कर्तव्य…
और भूमिका होती है।
काल… परिस्थिति… और भूमिका के अनुसार…
कर्म बदलना ही… धर्म है।"
इसका अर्थ:
हर चीज़ को पकड़े रहना… उचित नहीं —
जैसे बचपन का खेल…
जवानी की मस्ती…
या किसी रिश्ते की आसक्ति।
समय आने पर… मोह त्यागना…
और नए कर्तव्यों को अपनाना…
यही है… जीवन की प्रगति।
श्रीकृष्ण ने बांसुरी छोड़ी…
तो यह नहीं था कि… संगीत या प्रेम… बुरा है,
बल्कि इसलिए… कि अब… धर्मस्थापना और
लोककल्याण का समय था।
श्री कृष्णा हमें यह सीख मिलती है कि
1️⃣ समय की पहचान —
कब प्रेम में रहना है…
कब त्याग करना है…
कब कर्तव्य निभाना है।
2️⃣ कर्तव्य बदलना कमजोरी नहीं है —
यह… परिपक्वता और विकास का संकेत है।
3️⃣ एक काम… एक भूमिका… जीवनभर नहीं चलती —
जैसे ऋतुएँ बदलती हैं…
वैसे ही… हमारी जिम्मेदारियाँ भी।
4️⃣ त्याग… खोना नहीं है —
बल्कि आगे बढ़ना है…
पुराने से हटकर… नए और बड़े लक्ष्य की ओर जाना।
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